मंगलवार 20 अक्टूबर 2026 - 16:48
हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स) की सीरत को व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक जीवन में अपनाएं: हुज्जतुल इस्लाम नासिर ख़लज

हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स) के पवित्र हरम के ख़तीब हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन नासिर ख़लज ने कहा कि अय्याम-ए-फ़ातिमिया, हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स) की सीरत को समझने और उसे अपने व्यक्तिगत, पारिवारिक तथा सामाजिक जीवन में अपनाने का बेहतरीन अवसर है। प्रतिदिन कुरआन की तिलावत करना, जरूरतमंदों की मदद करना, लोगों की समस्याओं को हल करना, रिश्तों में न्याय करना और दूसरों को स्वयं पर प्राथमिकता देना, आपकी सीरत के महत्वपूर्ण सबक हैं।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन नासिर ख़लज ने पवित्र हरम में आयोजित एक मजलिस को संबोधित करते हुए कहा कि हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स) सभी मोमिनों और इमाम ज़माना (अज्जल्लाहु तआला फ़रजहुश्शरीफ़) के लिए बेहतरीन आदर्श हैं। आप (स) से सच्ची मोहब्बत का इज़हार तभी होता है, जब मनुष्य अपने नैतिक आचरण, पारिवारिक संबंधों और सामाजिक व्यवहार को आपकी सीरत के अनुरूप बनाए।

प्रतिदिन कुरआन की तिलावत जरूरी है

हुज्जतुल इस्लाम ख़लज ने कहा कि कुरआन मजीद से गहरा संबंध हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स) के जीवन की प्रमुख विशेषताओं में से एक था। अहले बैत (अ) से मोहब्बत करने वालों को प्रतिदिन कुरआन पढ़ने की आदत डालनी चाहिए। शुरुआत में कुछ पन्नों की तिलावत भी पर्याप्त है, बशर्ते इसे नियमित रूप से किया जाए।

उन्होंने कहा कि कुरआन केवल तिलावत की किताब नहीं है, बल्कि यह जीवन के विभिन्न मामलों में मार्गदर्शन प्रदान करता है।

इन्फ़ाक केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं

उन्होंने कहा कि दूसरों की मदद करना केवल धन खर्च करने तक सीमित नहीं है, बल्कि अपने ज्ञान, क्षमताओं, सामाजिक प्रभाव और प्रतिष्ठा का उपयोग करके लोगों की समस्याओं को हल करना भी इन्फ़ाक है।

किसी जरूरतमंद को रोजगार दिलाना, दो परिवारों के बीच मतभेद समाप्त कराना और परेशानहाल व्यक्ति की सहायता करना भी नेकी के कार्य हैं।

उन्होंने अहले बैत (अ) की सीरत का उल्लेख करते हुए कहा कि दूसरों की मदद करते समय मनुष्य को यह नहीं सोचना चाहिए कि वह अपना कुछ खो रहा है। बल्कि अल्लाह की राह में खर्च करना बरकत और आध्यात्मिक उन्नति का माध्यम है।

परिवार और समाज में दूसरों का ध्यान रखें

हुज्जतुल इस्लाम ख़लज ने कहा कि हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स) की सीरत हमें सिखाती है कि घर और कार्यस्थल पर दूसरों की क्षमताओं तथा परिस्थितियों का ध्यान रखा जाए और उन पर अनावश्यक बोझ न डाला जाए। इसी तरह मनुष्य को स्वार्थ से बचते हुए दूसरों की जरूरतों को भी महत्व देना चाहिए।

उन्होंने हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स) की उस सीरत की ओर ध्यान दिलाया, जिसके अनुसार आप दूसरों के लिए दुआ करती थीं और उन्हें स्वयं पर प्राथमिकता देती थीं।

उन्होंने जोर देकर कहा कि अहले बैत (अ) से मोहब्बत को अपने व्यावहारिक आचरण में उतारना चाहिए तथा कुरआन से जुड़ाव, जरूरतमंदों की सहायता, न्याय और दूसरों के प्रति भलाई की भावना को अपने जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए।

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